दिल्ली के गुलमोहर पार्क में रहने वाले 78 साल के शर्मा जी, एक रिटायर्ड बैंकर, अपनी रिटायरमेंट की जिंदगी शांति से जी रहे थे. लेकिन एक दिन फोन की घंटी बजी “मैं मुंबई पुलिस से बोल रहा हूं… आपका आधार कार्ड ड्रग्स तस्करी और पुलवामा हमले में इस्तेमाल हुआ है. अब आपको जांच में सहयोग करना होगा.” शर्मा जी सन्न रह गए. इतने गंभीर आरोप! उसी दिन शाम को फिर कॉल आया-इस बार सामने वाले ने खुद को ED का अधिकारी बताया. अगले दिन CBI का अफसर बनकर किसी और ने कॉल किया.
“आप अब हमारी निगरानी में हैं. आपको घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं है. जब तक जांच पूरी नहीं होती, आप डिजिटल अरेस्ट में रहेंगे.”
शर्मा जी डर के मारे चुप हो गए. महीनेभर तक वे घर से बाहर नहीं निकले. ठग रोज़ उन्हें कॉल करते, डांटते और कहते –
“अपना पैसा हमारे बताए अकाउंट में ट्रांसफर करो, वरना गिरफ्तारी पक्की है.”
डरे-सहमे शर्मा जी ने एक-एक कर के अपने अकाउंट से करोड़ों रुपये निकालकर उनके बताए खातों में भेज दिए. पूरे ₹23 करोड़.
आंखें तब खुलीं…
4 सितंबर को अचानक कॉल आना बंद हो गए. ठग गायब हो गए. शर्मा जी को समझ आया कि उनके साथ बड़ा धोखा हुआ है.उन्होंने हिम्मत करके 19 सितंबर को NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने केस IFSO यूनिट को सौंपा और जांच शुरू हुई.अब तक पुलिस ₹12.11 करोड़ की रकम फ्रीज़ कर चुकी है. लेकिन यह अनुभव शर्मा जी को जिंदगीभर याद रहेगा.
सबक
ठगों ने डर और सरकारी नाम का सहारा लेकर शर्मा जी को कैद कर दिया, वो भी बिना ताले और जेल के – सिर्फ फोन पर.
इसे ही कहा गया “डिजिटल अरेस्ट”.
सबक साफ है कोई भी पुलिस, ED या CBI फोन पर केस नहीं बताती.किसी भी अनजान खाते में पैसा ट्रांसफर न करें.ऐसे कॉल मिलते ही तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन या पुलिस से संपर्क करें.
यहां तो आपने कहानी सुनी है…अब आपको पुलिल एफआईआर में आई पूरी डिटेल बताते हैं….
असल में पूरा मामले में पुलिस ने बताया कि 4 अगस्त से शुरू हुआ खेल: एक कॉल आया, खुद को मुंबई पुलिस का अफसर बताने वाले शख्स ने कहा कि आपका नाम ड्रग रैकेट से जुड़ा है.इसके बाद ठगों ने ED और CBI अधिकारियों का रूप धरा, पीड़ित को कहा – आप घर से बाहर नहीं निकल सकते, आप “इन्वेस्टिगेशन” के तहत डिजिटल अरेस्ट में हैं.लगातार एक महीने तक पीड़ित को डराया और धमकाया गया.इस दौरान पीड़ित ने डर के मारे अपनी पूरी सेविंग्स अलग-अलग खातों में भेज दी.
पुलिस की जांच
पीड़ित ने 19 सितंबर को NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई.केस IFSO यूनिट को सौंपा गया.अब तक ₹12.11 करोड़ की रकम विभिन्न खातों में फ्रीज़ कर दी गई है.पुलिस की जांच में सामने आया कि ठगों ने रकम को कई खातों में घुमाकर देशभर से कैश निकाला ताकि ट्रैक करना मुश्किल हो.
असर और सबक
नई चालाकी- साइबर ठग अब डिजिटल अरेस्ट जैसी नई तरकीब से लोगों को मानसिक रूप से कैद कर रहे हैं.डर का फायदा: लोग बदनामी या गिरफ्तारी के डर से पुलिस को भी जानकारी देने से बचते हैं और लाखों-करोड़ों गंवा बैठते हैं.
सावधानी जरूरी
कोई भी सरकारी एजेंसी फोन पर जांच या गिरफ्तारी नहीं करती.ऐसे कॉल आते ही तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें.किसी भी अनजान खाते में पैसे ट्रांसफर न करें.
