कोलकाता की बिजनेस गलियों में एक नाम हमेशा भारी रहा.. पवन रुइया.एक वक्त में उनके ऑफिस की चमक-दमक देखकर लोग कहते थे, ये वो आदमी है जो इंडस्ट्री बदल देगा.लेकिन अब वही नाम पश्चिम बंगाल पुलिस की साइबर क्राइम विंग की जांच में है -एक ऐसे नेटवर्क के लिए जिसने 317 करोड़ रुपये की ऑनलाइन ठगी से देशभर में हड़कंप मचा दिया है.
कहानी की शुरुआत – 148 कंपनियां और एक मकसद
बैरकपुर साइबर पुलिस को कुछ महीनों पहले शिकायतें मिलने लगीं -लोगों के अकाउंट से पैसे गायब हो रहे हैं, और रकम कॉर्पोरेट ट्रांजैक्शन के नाम पर भेजी जा रही है.शुरुआती जांच में एक बड़ा रहस्य सामने आया -148 कंपनियां, जिनका काम सिर्फ एक था – पैसे इधर से उधर भेजना.इनमें से कई कंपनियों का रजिस्टर्ड पता एक ही निकला.नाम अलग-अलग, पर साइन करने वाले वही लोग.
फंड ट्रांसफर से ठगी तक – पूरा खेल
एक अधिकारी ने बताया -यह नेटवर्क ऐसे काम करता था जैसे किसी फिल्म का प्लॉट हो.
पहला स्टेप:
ठग छोटे निवेशकों, सप्लायर्स और बिजनेस क्लाइंट्स को फर्जी इनवॉइस भेजते थे.
कई मामलों में AI से तैयार किए गए ईमेल और वेबसाइट इस्तेमाल होते थे ताकि असली लगें.
दूसरा स्टेप:
लोग पैसे जमा करते, यह सोचकर कि वे किसी वैध डील या ट्रेडिंग में निवेश कर रहे हैं.
तीसरा स्टेप:
रकम 148 कंपनियों के खातों में जाती, फिर वहां से म्यूल अकाउंट्स (डमी खातों) में ट्रांसफर होती.
और…इन अकाउंट्स से लगभग ₹170 करोड़ को क्रिप्टोकरेंसी में बदल दिया गया, ताकि ट्रेस न किया जा सके.
छापे और खुलासे
5 नवंबर को बैरकपुर साइबर पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेकर FIR दर्ज की.नाम आया – पवन रुइया, उनका परिवार और करीबियों का.6 नवंबर को पुलिस टीमों ने एक साथ कई जगह छापे मारे –
Ruia Centre (Park Circus)
Dunlop Industrial Products (Park Street)
Berger House (Park Street Police Station)
और रुइया का बालीगंज वाला घर-ऑफिस के सर्वर, बैंक रिकॉर्ड और कंप्यूटर जब्त किए गए.
एक जांच अधिकारी ने कहा -डॉक्यूमेंट्स की भाषा प्रोफेशनल थी, पर हर डील का मकसद एक ही था – पैसों को गोल-गोल घुमाना.
AI और क्रिप्टो बने ठगों के हथियार
जांच में यह भी सामने आया कि ठगों ने AI टूल्स से फर्जी इनवॉइस और ईमेल तैयार किए, ताकि ट्रांजैक्शन वैध लगें.पुलिस के मुताबिक, ठगों ने हर ट्रांसफर को स्मार्ट इनवॉइसिंग सिस्टम का नाम दिया था.AI ने फ्रॉड को प्रोफेशनल बना दिया. ठग अब टाइप नहीं करते – बॉट्स उनके लिए ईमेल भेजते हैं. – पुलिस अधिकारी
1,379 लोग बने शिकार
अब तक की जांच में पता चला है कि 1,379 लोग देशभर में इस फ्रॉड के शिकार हुए.किसी ने सप्लाई का पेमेंट किया, किसी ने बिजनेस डील में इनवेस्ट किया.लेकिन पैसा कभी वहां पहुंचा ही नहीं -वो 148 कंपनियों की दीवारों में गुम हो गया.
क्या कहती है पुलिस
पुलिस का कहना है कि यह अब तक का सबसे बड़ा कॉरपोरेट साइबर फ्रॉड है.हम सिर्फ अपराधियों को नहीं पकड़ रहे, बल्कि सिस्टम की कमजोरी भी देख रहे हैं.आज ठगों को कंप्यूटर चाहिए, बंदूक नहीं.
सीख क्या है इस कहानी से
शेल कंपनी से सावधान रहें –
अगर किसी डील में कंपनी नई है, और उसके कई नामों पर एक ही पता दिखे, तो जांच करें.
AI-Generated ईमेल पर भरोसा न करें –
मेल, इनवॉइस या कॉन्ट्रैक्ट की सच्चाई बैंक या कंपनी वेबसाइट से खुद वेरिफाई करें.
क्रिप्टो में निवेश या पेमेंट सोच-समझकर करें –
एक बार रकम क्रिप्टो में जाने के बाद ट्रेस करना बेहद मुश्किल होता है.
संदेह होने पर तुरंत रिपोर्ट करें –
www.cybercrime.gov.in या हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करें.
अंत – चमकदार बोर्ड के पीछे का स्याह सच
रुइया का ऑफिस अब सील है.
पार्क स्ट्रीट की इमारतों में वो रौनक नहीं रही.
पर एक बात सबको समझ में आ गई –
अब ठगी का चेहरा बदल गया है.
वो सूट-बूट पहनकर कंपनी खोलती है, और क्रिप्टो में गायब हो जाती है.
यह कहानी सिर्फ एक कारोबारी की नहीं –
यह चेतावनी है उन सबके लिए जो सोचते हैं कि ठग हमेशा छोटे होते हैं.
अब ठग भी कंपनी बनाते हैं, वेबसाइट बनाते हैं… और आपकी स्क्रीन से करोड़ों ले जाते हैं.
