गुजरात के बनासकांठा जिले के कांकरेज तालुका में कासरा नाम का एक छोटा-सा गांव है.वहीं रहता था रामू, एक बिलकुल साधारण-सा आदमी.उम्र लगभग 35 साल.दिनभर मजदूरी करता, जो मिला वही खा लिया.ना ज्यादा पढ़ाई, ना बैंक-बैलेंस, बस जिंदगी जैसी है वैसे ही जीने वाला आदमी.
एक दिन दो भाई, दिलीप चौधरी और शैलेश चौधरी, गांव में आए.दोनों बिल्कुल अच्छे कपड़ों में, मोबाइल हाथ में, और बात करने का तरीका भी शहर जैसा.रामू को लगा शायद किसी कंपनी के लोग होंगे.
दिलीप ने मुस्कुराते हुए कहा,रामू भाई, एक छोटा सा काम है… आपकी मदद चाहिए.आपको दो हजार रुपये मिलेंगे. बस अपना बैंक अकाउंट का ATM कार्ड, चेकबुक और साइन कर दीजिए.आपका कोई नुकसान नहीं होगा.
रामू की आंखों में चमक आ गई.दो हजार रुपये उसके लिए किसी त्यौहार से कम नहीं थे.पत्नी की दवाई बाकी थी… बच्चों की फीस भी.उसने बिना ज्यादा सोचे, कह दिया,ले जाओ भाई… क्या करना है करो.
ATM कार्ड, चेकबुक, पासबुक सब उनके हाथ में.रामू को बस लगता रहा – कोई बड़ी कंपनी वाला उसका अकाउंट इस्तेमाल कर रहा होगा.छोटे लोगों को अक्सर बड़ा खेल दिखाई नहीं देता.
लेकिन असलियत बहुत अलग थी.कुछ हफ्तों बाद जिला पुलिस के दो लोग उसके घर पहुंचे.रामू का दिल जोर से धड़कने लगा.कभी जीवन में पुलिस से पाला नहीं पड़ा था.
क्या मैं रामू हूं?
एक अधिकारी ने पूछा.
रामू ने घबराकर कहा,
जी साहब… मैंने क्या किया?
अधिकारी ने बताया,तुम्हारे बैंक अकाउंट से होकर 247 करोड़ रुपये गए हैं.ये अकाउंट चाइनीज साइबर फ्रॉड सिंडिकेट द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग के लिए इस्तेमाल किया गया है.
रामू की समझ ही खत्म हो गई.साहब मेरे पास तो इतने पैसे सपने में भी नहीं होते.
पुलिस वाले ने धीरे से समझाया -दिलीप और शैलेश जिन लोगों ने तुम्हारा ATM और चेकबुक लिया…
वो लोगों के अकाउंट को म्यूल अकाउंट बनाते थे.गरीब और बेरोजगार लोगों के दस्तावेज लेकर बैंक अकाउंट खोलते थे.फिर वो डेटा Telegram के ज़रिए कंबोडिया–म्यांमार में बैठे चीनी ठगों को बेच देते थे.
उन्होंने आगे बताया —ठगी का पैसा पहले तुम्हारे अकाउंट में आता…फिर ऑनलाइन, ATM से निकालकर या सीधे दुबई भेज दिया जाता.OTP तक इन गैंग के पास पहुंच जाता था —तुम्हें तो पता भी नहीं चलता.
रामू के पैरों तले जमीन खिसक गई.उसे समझ आया कि दो हजार रुपये में उसने अपनी जिंदगी बेच दी थी.
पुलिस ने बाद में बताया कि देशभर में 542 शिकायतें इस रैकेट से जुड़ चुकी हैं.और ये दोनों भाई सैकड़ों म्यूल अकाउंट सप्लाई कर चुके थे.
लेकिन सबसे ज्यादा डर रामू को इसी बात का था -जेल कौन जाएगा? वो दो हजार रुपये लेने वाला गरीब…
या करोड़ों घुमाने वाला गैंग?
कानून में कहा गया –अकाउंट जिस आदमी के नाम पर है, जिम्मेदारी भी उसी की है. रामू की आंखों में आंसू आ गए.साहब, मैंने तो मजबूरी में दे दिया था… मुझे तो म्यूल अकाउंट का मतलब भी नहीं पता.
लेकिन गलती गलती थी.
उस दिन से रामू एक बात समझ गया
गरीबी में लालच सबसे बड़ा जाल होता है.
और बैंक अकाउंट किसी का खिलौना नहीं.
कहानी खत्म नहीं हुई…
क्योंकि यह कहानी सिर्फ रामू की नहीं है.
भारत में हर उस आदमी की है
जो आज भी दो–चार हजार के लिए
अपना बैंक अकाउंट किसी और को दे देता है
बिना समझे कि उसकी एक साइन से
कौन सा अपराध घूमकर उसके सिर आ गिरता
