भैया, क्या आपने कभी सुना है कि कोई अपने ही घर में, बिना किसी पहरेदार के, पूरे 38 दिनों तक कोई कैदी बना रहे? और इस ‘डिजिटल जेल’ की कीमत चुकानी पड़े सवा तीन करोड़ रुपये! ये कोई वेब सीरीज़ की कहानी नहीं है, बल्कि एक रिटायर्ड एयरफ़ोर्स अधिकारी के परिवार के साथ बीती असल दास्तां है। कैसे हुआ ये सब? तसल्ली से सुनिए।
खेल शुरू हुआ एक कूरियर कॉल से। अधिकारी साहब की बेटी को फोन आता है— “मैडम, आपके पार्सल में पोर्नोग्राफ़ी मिली है!” बेटी घबराती है, तो जालसाज पासा पलट देता है— “अरे, आपका नाम तो नरेश गोयल मनी लॉन्ड्रिंग केस में भी है!”

अब एंट्री होती है ‘फर्जी साहबों’ की। वीडियो कॉल पर बाकायदा कोर्ट का सेट लगाया गया, फर्जी जज और पुलिस वाले दिखाए गए। परिवार को इतना डरा दिया गया कि उन्हें लगा कि अगर उन्होंने पलक भी झपकाई, तो सलाखों के पीछे होंगे।
इसे कहते हैं ‘डिजिटल अरेस्ट’। पूरे 38 दिन! कल्पना कीजिए, परिवार को हर 8 घंटे में ठगों को ‘हाजिरी’ देनी पड़ती थी। घर से बाहर निकलने के लिए इन अपराधियों से इजाज़त लेनी पड़ती थी।
ठगों ने कहा— “अगर क्लीन चिट चाहिए, तो सारा पैसा हमारे ‘जाँच खातों’ में डाल दो, वेरिफिकेशन के बाद वापस मिल जाएगा।” डर का आलम ये था कि परिवार ने अपनी ज़िंदगी भर की कमाई, यानी 3 करोड़ 21 लाख रुपये उनके हवाले कर दिए।
अब इस पूरे मामले का ‘लल्लनटॉप’ ज्ञान ले लीजिए, ताकि आपके घर का दरवाज़ा कोई डिजिटल ठग न खटखटाए:
– भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जहाँ पुलिस या कोर्ट आपको वीडियो कॉल पर ‘अरेस्ट’ करे। ये 100% फर्जीवाड़ा है।
– कोई भी सरकारी एजेंसी जांच के नाम पर आपके बैंक खाते का पैसा अपने खाते में ट्रांसफर नहीं करवाती। अगर कोई पैसा मांगे, तो समझो वो डकैत है।
– पोर्नोग्राफी और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ आपको मानसिक रूप से तोड़ने के लिए किया जाता है।
38वें दिन जब बेटी घर से बाहर निकली और किसी को ये बात बताई, तब जाकर समझ आया कि वो किसी जांच में नहीं, बल्कि लुटेरों के जाल में थे। भइया, डरिए मत! अगर ऐसा कोई कॉल आए, तो तुरंत 1930 डायल कीजिए। सतर्क रहिए, क्योंकि आपकी जागरूकता ही आपका सबसे बड़ा हथियार है। जय हिंद!

