अब सवाल उठता है कि अगर कोई सिर्फ फिशिंग किट खरीदकर ठगी कर सकता है, तो क्या यही सबसे बड़ा खतरा है? जवाब है… नहीं…असल खतरा उससे कहीं बड़ा है.डार्क वेब पर अब सिर्फ नकली बैंक वेबसाइटें नहीं बिकतीं. वहां पूरा फ्रॉड सप्लाई चेन तैयार मिलती है.यानी अगर कोई ठग किसी व्यक्ति को फंसाना चाहता है, तो उसे अलग-अलग लोगों की जरूरत नहीं पड़ती. पूरा सिस्टम एक ही जगह उपलब्ध है.
यहां पहचान से जुड़ा डेटा बिकता है.Mule Accounts यानी ऐसे बैंक खाते, जिनके जरिए चोरी का पैसा घुमाया जाता है.
फर्जी SIM कार्ड, OTP इंटरसेप्ट करने वाले टूल, नकली कस्टमर केयर सेंटर, Deepfake वीडियो बनाने वाले AI टूल. KYC पास कराने वाली सेवाएं. और चोरी का पैसा अलग-अलग खातों में भेजने वाले पेमेंट रूटिंग सिस्टम.
यानी अपराध अब टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक संगठित उद्योग की तरह चल रहा है.एक्सपर्ट्स कहते हैं कि पहले डार्क वेब पर सिर्फ चोरी हुआ डेटा बिकता था.
लेकिन अब पूरा फ्रॉड मॉड्यूल बिकने लगा है.अगर कोई Romance Scam करना चाहता है, तो उसके लिए भी पूरा पैकेज खरीद सकता है.
उसे अलग से कुछ बनाने की जरूरत नहीं पड़ती.यही वजह है कि आज साइबर ठगी पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गई है.
कीमत सुनकर शायद आपको यकीन भी न हो.सिर्फ 20 डॉलर (करीब 1,900 रुपये) महीने में बेसिक फ्रॉड टेम्पलेट मिल जाते हैं.
अगर लाइव Telegram या WhatsApp सपोर्ट भी चाहिए, तो करीब 50 डॉलर (करीब 4,755 रुपये) खर्च करने पड़ते हैं.
वहीं Deepfake KYC तैयार करने वाले AI टूल का सब्सक्रिप्शन करीब 160 डॉलर (करीब 15,220 रुपये) में उपलब्ध है. कुछ हजार रुपये खर्च करके कोई भी सैकड़ों फर्जी अकाउंट बना सकता है.
भारत की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सबसे बड़ी चुनौती Mule Accounts हैं.एक्सपर्ट्स बताते हैं कि Telegram और WhatsApp ग्रुप्स में युवाओं को हर हफ्ते 5,000 रुपये तक कमाने का लालच दिया जाता है.
उनसे सिर्फ इतना कहा जाता है कि अपने बैंक खाते से कुछ लेनदेन होने दें.ज्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उनका बैंक अकाउंट साइबर अपराधियों के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का जरिया बन चुका है.यानी वे अनजाने में अपराध का हिस्सा बन जाते हैं.
भारत क्यों सबसे बड़ा निशाना बन गया?
इसकी सबसे बड़ी वजह है देश में डिजिटल लेनदेन की तेज रफ्तार.UPI ने पैसे भेजना सेकेंडों का काम बना दिया.
Tier-2 और Tier-3 शहरों के करोड़ों लोग पहली बार डिजिटल पेमेंट कर रहे हैं.लेकिन डिजिटल सुविधा जितनी तेजी से बढ़ी, डिजिटल जागरूकता उतनी तेजी से नहीं बढ़ी.
एक्सपर्ट कहते हैं,भारत ने UPI जैसी Ferrari तो बना ली, लेकिन उसमें ब्रेक लगाना भूल गया.उनका कहना है कि देश के करीब 86% घर इंटरनेट से जुड़े हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के भीतर अभी भी Fraud Reflex यानी ठगी को तुरंत पहचानने की क्षमता विकसित नहीं हुई है.यही वजह है कि साइबर अपराधियों के लिए भारत सबसे आकर्षक बाजार बनता जा रहा है.
सिर्फ 400 रुपये में आपकी पहचान तैयार
Bureau की रिपोर्ट ‘India Fraud Report 2026: Digital Fraud at Scale’ के मुताबिक किसी भी व्यक्ति की पूरी डिजिटल पहचान 400 रुपये से भी कम में तैयार की जा सकती है.
रिपोर्ट कहती है कि जो काम पहले तकनीकी विशेषज्ञता और अपराधियों के बड़े नेटवर्क से होता था, अब सिर्फ एक ऑनलाइन पेमेंट से संभव हो गया है.
22,495 करोड़ रुपये की ठगी
भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के आंकड़े डराने वाले हैं.साल 2025 में भारत में साइबर अपराध के कारण 22,495 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.यह 2024 के मुकाबले 24% ज्यादा है.
देशभर में 28.15 लाख साइबर अपराध दर्ज किए गए.सबसे ज्यादा नुकसान Investment Scam से हुआ, जिसने कुल नुकसान का 76% हिस्सा लिया.
वहीं Digital Arrest Scam का हिस्सा करीब 9% रहा.हालांकि एजेंसियां भी लगातार कार्रवाई कर रही हैं.बैंकों ने I4C रजिस्ट्री के जरिए 18.43 लाख संदिग्ध पहचान और 24.67 लाख Mule Accounts साझा किए.
इससे करीब 8,031 करोड़ रुपये की संभावित ठगी रोकी जा सकी.लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि हमले अभी भी लगातार बढ़ रहे हैं.
जामताड़ा अकेला नहीं रहा
एक समय साइबर ठगी का नाम आते ही लोगों के दिमाग में सिर्फ जामताड़ा आता था.लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है.अब जांच एजेंसियों की नजर नूंह, अलवर, भरतपुर, मथुरा, बोकारो, अहमदाबाद, हैदराबाद, चंडीगढ़, गुवाहाटी और विशाखापत्तनम जैसे शहरों पर भी है.यानी साइबर अपराध अब पूरे देश में फैल चुका है.
कंपनियां भी नहीं बच रहीं
सिर्फ आम लोग ही नहीं, बड़ी कंपनियां भी AI फ्रॉड की चपेट में हैं.ई-कॉमर्स कंपनियों में Refund Abuse, Reseller Fraud, Fake Accounts और Account Takeover जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं.
Bureau का अनुमान है कि बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स में Reseller Fraud के कारण Gross Merchandise Value का 2% से 5% तक नुकसान हो रहा है.
वहीं Food Delivery कंपनियों को हर महीने 10 करोड़ से 30 करोड़ रुपये तक का फ्रॉड झेलना पड़ रहा है.
AI से बनी तस्वीरों का इस्तेमाल कर लोग टूटे हुए प्रोडक्ट दिखाकर फर्जी रिफंड ले रहे हैं.कई मामलों में एक ही मोबाइल फोन से सैकड़ों अकाउंट बनाए जाते हैं.पहले ऑफर लूटे जाते हैं.फिर उन्हीं अकाउंट्स में सेव पेमेंट डिटेल्स का दुरुपयोग किया जाता है.
AI ने बढ़ा दी नई मुसीबत
एक्सपर्ट्स आगे बताते हैं कि आज 82.6% फिशिंग ईमेल AI की मदद से तैयार किए जा रहे हैं.वहीं BioCatch के आंकड़ों के मुताबिक भारत के 47% वयस्क या तो AI Voice Cloning या Deepfake Scam का शिकार हो चुके हैं या किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो इसका शिकार हुआ है.
बचाव कैसे हो रहा है?
Cybersecurity कंपनियां भी अब AI से लड़ने के लिए AI का सहारा ले रही हैं.Indusface नई कमजोरियां मशीन की रफ्तार से खोज रही है.
Blue Cloud Softech Solutions डार्क वेब मॉनिटरिंग कर रही है.साइबर सिक्योरिटी ऐप तैयार किया है, जिसमें इंश्योरेंस भी शामिल है.वहीं Seclore कंपनियों के संवेदनशील डेटा की सुरक्षा पर काम कर रही है.
पुलिस की सबसे बड़ी चुनौती
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पहले साइबर अपराध छोटे-छोटे गैंग तक सीमित थे.लेकिन अब यह पूरी तरह संगठित और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बन चुका है.अब अपराधी AI टूल्स, Mule Accounts, SIM नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करके सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठा रहे हैं.उनका मानना है कि Digital Personal Data Protection Act का सख्ती से पालन डेटा लीक रोकने और जवाबदेही तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.
सबसे बड़ा सबक
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब साइबर ठगी को सिर्फ एक अपराध मानकर नहीं देखा जा सकता.
यह एक ऐसा उद्योग बन चुका है, जहां सब्सक्रिप्शन हैं.
सर्विस डेस्क हैं.
कस्टमर सपोर्ट है.
नियमित अपडेट हैं.AI है.
और अरबों डॉलर का कारोबार है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एक बात इस पूरी कहानी का सबसे सटीक निष्कर्ष है.
सवाल सिर्फ Digital India बनने का नहीं है. असली चुनौती Trusted Digital India बनने की है. जब तक हम फ्रॉड को एक संगठित उद्योग मानकर नहीं तोड़ेंगे, तब तक सिर्फ अपराधियों को पकड़ने से यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती.”
