Friday, July 17, 2026
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इलाज का ड्रामा, QR पेमेंट का झूठ… 50 हजार की ठगी के बाद ऐसे पकड़े गए शातिर आरोपी

by Anuradha Pandey

सुबह का वक्त था. जन सेवा केंद्र पर रोज की तरह लोगों की भीड़ लगी थी. कोई बिजली का बिल जमा करा रहा था, तो कोई पैसे निकालने आया था. तभी तीन युवक वहां पहुंचे. उनके चेहरे पर घबराहट थी और आवाज में जल्दबाजी.

उन्होंने संचालक से कहा, “भाई साहब, घर में इलाज की बहुत बड़ी जरूरत है. अभी तुरंत पैसे चाहिए. हमने आपके बिजनेस क्यूआर कोड पर ऑनलाइन पेमेंट कर दिया है, बस आप हमें नकद दे दीजिए.”

सामने खड़े लोगों को भी लगा कि मामला किसी की जान बचाने का है. ऐसे में जन सेवा केंद्र संचालक संदीप वर्मा ने भी ज्यादा देर नहीं लगाई. उन्हें लगा कि पैसे खाते में आ गए होंगे, इसलिए उन्होंने नकद रकम दे दी. लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह पूरी कहानी इलाज की नहीं, बल्कि ठगी की थी.

दो दिन में उड़ गए 50 हजार रुपये
पुलिस के मुताबिक, यह घटना 25 और 27 अप्रैल 2026 की है.आरोपियों ने दो अलग-अलग मौकों पर इलाज की मजबूरी बताकर संचालक को भरोसे में लिया. उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पेमेंट हो चुका है और अब सिर्फ नकद की जरूरत है.

इसी भरोसे में आकर संचालक ने कुल 50,950 रुपये नकद दे दिए.कुछ देर बाद जब उन्होंने लेनदेन की जांच की, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.जिस रकम के आने की बात कही गई थी, वह बैंक में होल्ड थी. यानी पैसा वास्तव में उनके खाते में उपलब्ध ही नहीं था.

अब समझ आया कि ठगी हो चुकी है
संदीप वर्मा ने तुरंत आसपास के लोगों से जानकारी जुटाई और अपने जन सेवा केंद्र में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी.फुटेज में तीनों युवकों की तस्वीरें साफ दिखाई दे रही थीं. स्थानीय लोगों की मदद से उनकी पहचान हुई. इसके बाद साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई गई.

‘साइबर वज्र’ अभियान में पुलिस के हाथ लगी सफलता
मामले की जांच शुरू हुई. साइबर मुख्यालय लखनऊ के ‘साइबर वज्र’ अभियान के तहत पुलिस लगातार आरोपियों की तलाश कर रही थी.आखिरकार मंगलवार सुबह करीब 9 बजे अमहट पुल से फोरलेन जाने वाली सड़क पर पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.गिरफ्तार आरोपियों की पहचान विकास चौधरी उर्फ कार्तिक, राज यादव और महेंद्र चौधरी उर्फ सत्या के रूप में हुई.हालांकि इस मामले का एक और आरोपी अभिजीत शर्मा अभी भी फरार है, जिसकी तलाश जारी है.

पुलिस पूछताछ में खुल गया पूरा खेल
पूछताछ के दौरान आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.उन्होंने बताया कि ठगी से मिली रकम को जन सेवा केंद्र के जरिए नकद निकलवाया गया और बाद में आपस में बांट लिया गया.पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से दो एंड्रॉयड मोबाइल फोन, दो मोहरें और 1,000 रुपये नकद भी बरामद किए हैं.

पुलिस ने लोगों को क्या सलाह दी?
क्षेत्राधिकारी सदर सत्येंद्र भूषण तिवारी ने बताया कि साइबर अपराधों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है.उन्होंने लोगों से अपील की कि अगर कोई व्यक्ति क्यूआर कोड से पेमेंट करने का दावा करे, तो सिर्फ उसकी बात पर भरोसा न करें.जब तक रकम आपके बैंक खाते में पूरी तरह क्रेडिट होने की पुष्टि न हो जाए, तब तक किसी को भी नकद पैसे न दें.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी भी तरह की संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि दिखाई दे, तो तुरंत साइबर पुलिस को इसकी सूचना दें.

एक छोटी-सी जल्दबाजी, बड़ा नुकसान
यह कहानी सिर्फ 50,950 रुपये की ठगी की नहीं है. यह उस भरोसे की कहानी भी है, जिसका फायदा साइबर ठग उठा रहे हैं.
आजकल ठग अक्सर इलाज, दुर्घटना, इमरजेंसी या पारिवारिक परेशानी जैसी भावनात्मक बातें कहकर लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं.ऐसे में एक छोटी-सी सावधानी आपको बड़ी आर्थिक ठगी से बचा सकती है. याद रखिए, मोबाइल पर मैसेज दिख जाना या सामने वाले का भरोसा दिलाना काफी नहीं है. पैसा तभी मानिए, जब वह आपके बैंक खाते में वास्तव में जमा हो जाए.

बस्ती में इलाज की मजबूरी बताकर तीन युवकों ने जन सेवा केंद्र संचालक को ऑनलाइन पेमेंट का भरोसा दिलाया. नकद पैसे लेकर चले गए, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो हर कोई हैरान रह गया. आखिरकार साइबर पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया.

सुबह का वक्त था. जन सेवा केंद्र पर रोज की तरह लोगों की भीड़ लगी थी. कोई बिजली का बिल जमा करा रहा था, तो कोई पैसे निकालने आया था. तभी तीन युवक वहां पहुंचे. उनके चेहरे पर घबराहट थी और आवाज में जल्दबाजी.

उन्होंने संचालक से कहा, “भाई साहब, घर में इलाज की बहुत बड़ी जरूरत है. अभी तुरंत पैसे चाहिए. हमने आपके बिजनेस क्यूआर कोड पर ऑनलाइन पेमेंट कर दिया है, बस आप हमें नकद दे दीजिए.”

सामने खड़े लोगों को भी लगा कि मामला किसी की जान बचाने का है. ऐसे में जन सेवा केंद्र संचालक संदीप वर्मा ने भी ज्यादा देर नहीं लगाई. उन्हें लगा कि पैसे खाते में आ गए होंगे, इसलिए उन्होंने नकद रकम दे दी. लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह पूरी कहानी इलाज की नहीं, बल्कि ठगी की थी.

दो दिन में उड़ गए 50 हजार रुपये
पुलिस के मुताबिक, यह घटना 25 और 27 अप्रैल 2026 की है.आरोपियों ने दो अलग-अलग मौकों पर इलाज की मजबूरी बताकर संचालक को भरोसे में लिया. उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पेमेंट हो चुका है और अब सिर्फ नकद की जरूरत है.

इसी भरोसे में आकर संचालक ने कुल 50,950 रुपये नकद दे दिए.कुछ देर बाद जब उन्होंने लेनदेन की जांच की, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.जिस रकम के आने की बात कही गई थी, वह बैंक में होल्ड थी. यानी पैसा वास्तव में उनके खाते में उपलब्ध ही नहीं था.

अब समझ आया कि ठगी हो चुकी है
संदीप वर्मा ने तुरंत आसपास के लोगों से जानकारी जुटाई और अपने जन सेवा केंद्र में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी.फुटेज में तीनों युवकों की तस्वीरें साफ दिखाई दे रही थीं. स्थानीय लोगों की मदद से उनकी पहचान हुई. इसके बाद साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई गई.

‘साइबर वज्र’ अभियान में पुलिस के हाथ लगी सफलता
मामले की जांच शुरू हुई. साइबर मुख्यालय लखनऊ के ‘साइबर वज्र’ अभियान के तहत पुलिस लगातार आरोपियों की तलाश कर रही थी.आखिरकार मंगलवार सुबह करीब 9 बजे अमहट पुल से फोरलेन जाने वाली सड़क पर पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.गिरफ्तार आरोपियों की पहचान विकास चौधरी उर्फ कार्तिक, राज यादव और महेंद्र चौधरी उर्फ सत्या के रूप में हुई.हालांकि इस मामले का एक और आरोपी अभिजीत शर्मा अभी भी फरार है, जिसकी तलाश जारी है.

पुलिस पूछताछ में खुल गया पूरा खेल
पूछताछ के दौरान आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.उन्होंने बताया कि ठगी से मिली रकम को जन सेवा केंद्र के जरिए नकद निकलवाया गया और बाद में आपस में बांट लिया गया.पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से दो एंड्रॉयड मोबाइल फोन, दो मोहरें और 1,000 रुपये नकद भी बरामद किए हैं.

पुलिस ने लोगों को क्या सलाह दी?
क्षेत्राधिकारी सदर सत्येंद्र भूषण तिवारी ने बताया कि साइबर अपराधों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है.उन्होंने लोगों से अपील की कि अगर कोई व्यक्ति क्यूआर कोड से पेमेंट करने का दावा करे, तो सिर्फ उसकी बात पर भरोसा न करें.जब तक रकम आपके बैंक खाते में पूरी तरह क्रेडिट होने की पुष्टि न हो जाए, तब तक किसी को भी नकद पैसे न दें.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी भी तरह की संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि दिखाई दे, तो तुरंत साइबर पुलिस को इसकी सूचना दें.

एक छोटी-सी जल्दबाजी, बड़ा नुकसान
यह कहानी सिर्फ 50,950 रुपये की ठगी की नहीं है. यह उस भरोसे की कहानी भी है, जिसका फायदा साइबर ठग उठा रहे हैं.
आजकल ठग अक्सर इलाज, दुर्घटना, इमरजेंसी या पारिवारिक परेशानी जैसी भावनात्मक बातें कहकर लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं.ऐसे में एक छोटी-सी सावधानी आपको बड़ी आर्थिक ठगी से बचा सकती है. याद रखिए, मोबाइल पर मैसेज दिख जाना या सामने वाले का भरोसा दिलाना काफी नहीं है. पैसा तभी मानिए, जब वह आपके बैंक खाते में वास्तव में जमा हो जाए.

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