आप ऑफिस में बैठे हैं. रोज की तरह काम चल रहा है. तभी आपके WhatsApp पर कंपनी के चेयरमैन का मैसेज आता है. फोटो भी वही, नाम भी वही. मैसेज में लिखा है, “बहुत जरूरी पेमेंट करनी है. अभी तुरंत इन खातों में पैसे ट्रांसफर कर दो.”
आपको क्या लगेगा
ज्यादातर लोगों की तरह कंपनी के अकाउंटेंट को भी लगा कि यह मैसेज सचमुच उनके बॉस ने भेजा है. उन्होंने बिना शक किए ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर कर दिए.
लेकिन कुछ देर बाद जो सच सामने आया, उसने सभी के होश उड़ा दिए.जिस व्यक्ति को वह अपना बॉस समझ रहे थे, वह असल में एक साइबर ठग था. और सिर्फ कुछ मिनटों में कंपनी के खाते से ₹5.30 करोड़ निकल चुके थे.
यही है राजस्थान में सामने आए करोड़ों रुपये के साइबर फ्रॉड की कहानी, जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि आज के साइबर अपराधी हथियार नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा चुराते हैं.
शुरुआत सिर्फ एक WhatsApp DP से हुई
यह मामला Galaxy Mining Private Limited से जुड़ा है.27 अप्रैल 2026 को कंपनी की ओर से दीपेंद्र सिंह ने साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई.
शिकायत में बताया गया कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने नया WhatsApp नंबर बनाया. उस नंबर पर कंपनी के चेयरमैन दीपेंद्र सिंह राठौड़ का नाम और उनकी प्रोफाइल फोटो लगा दी. पहली नजर में देखने पर ऐसा लग रहा था कि मैसेज सीधे कंपनी के मालिक की तरफ से आया है.
एक मैसेज ने बदल दी पूरी कहानी
साइबर ठग ने कंपनी के अकाउंटेंट को मैसेज भेजा.मैसेज में दो बैंक खातों की जानकारी दी गई और कहा गया कि यह बहुत जरूरी पेमेंट है. इसे तुरंत करना है.
अकाउंटेंट ने WhatsApp पर बॉस का नाम और फोटो देखी. उन्हें जरा भी शक नहीं हुआ.
उन्होंने बिना किसी अतिरिक्त पुष्टि के दोनों खातों में ऑनलाइन ₹5.30 करोड़ ट्रांसफर कर दिए.
जब तक असली चेयरमैन से बात हुई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.कंपनी के करोड़ों रुपये साइबर ठगों के खातों में पहुंच चुके थे.
ठगों ने कैसे रची पूरी साजिश?
राजस्थान पुलिस की जांच में पता चला कि अपराधियों ने सबसे पहले कंपनी के चेयरमैन की प्रोफाइल फोटो और दूसरी सार्वजनिक जानकारी जुटाई.
इसके बाद उन्होंने एक नया WhatsApp नंबर लिया.उस पर चेयरमैन की वही फोटो लगाई.
नाम भी वही रखा.फिर सीधे कंपनी के अकाउंटेंट से संपर्क किया.यानी इस पूरे फ्रॉड में किसी सिस्टम को हैक नहीं किया गया. किसी पासवर्ड की जरूरत नहीं पड़ी.सिर्फ एक फर्जी WhatsApp DP और लोगों के भरोसे का इस्तेमाल करके करोड़ों रुपये ठग लिए गए.
फिर शुरू हुई पुलिस की जांच
शिकायत मिलने के बाद राजस्थान पुलिस की स्टेट साइबर क्राइम शाखा ने मामले की जांच शुरू की. जांच सिर्फ मोबाइल नंबर तक सीमित नहीं रही.पुलिस ने बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन, मोबाइल नंबर और तकनीकी सबूतों का गहराई से विश्लेषण किया.
इसी जांच के दौरान एक नाम सामने आया. राहुल अशोक, उम्र 32 साल, निवासी पुणे, महाराष्ट्र.
राजस्थान पुलिस ने महाराष्ट्र पुलिस की मदद से राहुल को पुणे से गिरफ्तार किया और ट्रांजिट रिमांड पर जयपुर लाया गया.
पूछताछ में सामने आया बड़ा खुलासा
पूछताछ के दौरान राहुल ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए.उसने बताया कि वह इस गैंग के लिए बैंक खाते उपलब्ध कराता था.इसके बदले उसे मोटा कमीशन मिलता था.
उसका काम खुद लोगों को ठगना नहीं था, बल्कि ठगी का पैसा इधर-उधर पहुंचाने के लिए बैंक खातों का इंतजाम करना था.सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि राहुल कोई बड़ा कारोबारी नहीं था.पुलिस के मुताबिक वह दिहाड़ी मजदूर है.
फर्जी कंपनी, फर्जी दस्तावेज और ₹50 करोड़ की लिमिट
जांच में पता चला कि पुणे के रहने वाले अमित सिंह के कहने पर राहुल ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एक फर्जी कंपनी रजिस्टर कराई.
इसी कंपनी के नाम पर एक करंट अकाउंट खुलवाया गया.पुलिस के मुताबिक मिलीभगत से इस खाते की क्रेडिट लिमिट ₹50 करोड़ तक बढ़ा दी गई.
यही बैंक खाता मार्च 2026 में हुए ₹5.30 करोड़ के साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल हुआ.इतना ही नहीं, राहुल ने गैंग के लिए तीन और बैंक खाते भी खुलवाए थे.
पैसा आते ही शुरू हो जाती थी नई चाल
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि जैसे ही ठगी का पैसा बैंक खाते में आता था, उसे तुरंत कई दूसरे खातों में भेज दिया जाता था.साइबर अपराध की भाषा में इसे लेयरिंग (Layering) कहा जाता है.
इसका मकसद होता है कि जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाए कि पैसा आखिर कहां गया.यानी पैसा एक खाते से दूसरे और फिर तीसरे खाते में भेज दिया जाता था, ताकि उसकी असली पहचान छिप जाए.
अब बैंक कर्मचारियों की भी जांच
राजस्थान पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि फर्जी कंपनी के नाम पर बैंक खाता खोलने और उसकी लिमिट ₹50 करोड़ तक बढ़ाने में कहीं किसी बैंक कर्मचारी की भूमिका तो नहीं थी.अगर जांच में किसी बैंक अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
मुख्य आरोपी अब भी फरार
पुलिस का कहना है कि इस पूरे गैंग का मास्टरमाइंड अभी गिरफ्त से बाहर है.मुख्य आरोपी अमित सिंह समेत बाकी आरोपियों की तलाश जारी है.पुलिस दूसरे बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल सबूतों की भी जांच कर रही है, ताकि पूरे गिरोह को पकड़ा जा सके.
इस ऑपरेशन में किसने निभाई अहम भूमिका?
मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य साइबर क्राइम थाना, जयपुर में एक विशेष टीम बनाई गई.यह टीम उप महानिरीक्षक पुलिस (साइबर क्राइम) शांतनु कुमार सिंह के निर्देशन और पुलिस अधीक्षक सुमित मेहरड़ा की निगरानी में काम कर रही थी.
टीम का नेतृत्व थानाधिकारी एवं पुलिस उपाधीक्षक गजेंद्र शर्मा ने किया.इसके अलावा पुलिस निरीक्षक मुकेश, कांस्टेबल अमित कुमार और कांस्टेबल जयसिंह ने भी जांच में अहम भूमिका निभाई.
इस घटना से क्या सीख मिलती है?
यह मामला सिर्फ ₹5.30 करोड़ की ठगी की कहानी नहीं है. यह उन हजारों कंपनियों और लाखों कर्मचारियों के लिए चेतावनी भी है, जो सिर्फ WhatsApp पर दिख रही फोटो और नाम देखकर निर्देशों पर भरोसा कर लेते हैं.
अगर किसी वरिष्ठ अधिकारी के नाम से अचानक पैसे ट्रांसफर करने का मैसेज आए, तो सिर्फ WhatsApp देखकर भरोसा न करें.
हमेशा फोन कॉल, वीडियो कॉल या किसी दूसरे आधिकारिक माध्यम से पुष्टि जरूर करें.क्योंकि आज के साइबर अपराधी सिस्टम से पहले इंसानों के भरोसे को निशाना बनाते हैं. और कई बार सिर्फ एक फोटो, एक मैसेज और कुछ मिनटों की जल्दबाजी करोड़ों रुपये का नुकसान करा देती है.
