मुनाफे की चमक के पीछे छिपा था ठगी का जाल
मोबाइल पर अचानक एक वॉट्सऐप ग्रुप से जुड़ने का मैसेज आया. ग्रुप में हर तरफ शेयर बाजार की बातें हो रही थीं. कोई मोटा मुनाफा कमाने का दावा कर रहा था, तो कोई सफल निवेश की कहानी सुना रहा था. खुद को निवेश विशेषज्ञ बताने वाले लोग लगातार स्टॉक मार्केट टिप्स दे रहे थे. दावा किया जा रहा था कि उनके बताए खास प्लैटफॉर्म के जरिए निवेश करने पर बहुत कम समय में असाधारण और पक्का मुनाफा मिल सकता है.
सूरत के रहने वाले एक व्यक्ति ने भी इन बातों पर भरोसा कर लिया. उसे क्या पता था कि मोबाइल स्क्रीन पर दिख रहा मुनाफा असली नहीं, बल्कि 27.20 लाख रुपये की ठगी के लिए बिछाया गया एक बड़ा जाल था. इस कहानी में वॉट्सऐप ग्रुप था. शेयर बाजार के कथित विशेषज्ञ थे. असली जैसी दिखने वाली ट्रेडिंग वेबसाइट थी. लॉगइन आईडी और पासवर्ड था. निवेश पर लगातार बढ़ता हुआ मुनाफा भी दिखाई दे रहा था. बस एक चीज असली नहीं थी. वह था पूरा निवेश प्लैटफॉर्म. जब इस ठगी का पर्दाफाश हुआ तो मामला सिर्फ 27.20 लाख रुपये तक सीमित नहीं रहा. जांच में एक बैंक खाते से 6.53 करोड़ रुपये से ज्यादा के संदिग्ध लेनदेन का पता चला. सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि इसी खाते के खिलाफ देशभर में साइबर फ्रॉड की 149 शिकायतें पहले से दर्ज थीं.
पहले भरोसा जीता, फिर दिखाई मुनाफे की दुनिया
ठगी की शुरुआत बेहद सामान्य तरीके से हुई. शिकायतकर्ता को एक वॉट्सऐप ग्रुप में जोड़ा गया. इस ग्रुप में खुद को पेशेवर वित्तीय सलाहकार और निवेश विशेषज्ञ बताने वाले लोग सक्रिय थे. ग्रुप में नियमित रूप से शेयर बाजार से जुड़े टिप्स पोस्ट किए जाते थे. इसके साथ ऐसी सफलता की कहानियां दिखाई जाती थीं, जिनसे लगता था कि ग्रुप के जरिए निवेश करने वाले लोग मोटा पैसा कमा रहे हैं. ग्रुप चलाने वाले लोगों ने खुद को बाजार की गहरी समझ रखने वाले विशेषज्ञ के रूप में पेश किया.
उनका दावा था कि उनके पास एक खास निवेश प्लैटफॉर्म है. इस प्लैटफॉर्म के जरिए शेयर बाजार में पैसा लगाने पर सामान्य निवेश के मुकाबले कहीं ज्यादा रिटर्न मिल सकता है. मुनाफा सिर्फ बड़ा नहीं, बल्कि तय बताया जा रहा था.
लगातार आ रहे संदेशों, स्टॉक मार्केट टिप्स और मुनाफे के दावों ने शिकायतकर्ता का भरोसा जीत लिया. उसे लगा कि उसके सामने कम समय में पैसा बढ़ाने का बड़ा मौका है. यहीं से वह उस जाल में फंस गया, जिसे कथित रूप से कई राज्यों में बैठे साइबर अपराधियों ने मिलकर तैयार किया था.
सामने आई असली जैसी दिखने वाली फर्जी वेबसाइट
भरोसा बन जाने के बाद शिकायतकर्ता को एक खास निवेश वेबसाइट पर अपना अकाउंट बनाने के लिए कहा गया. यह वेबसाइट देखने में किसी वास्तविक शेयर ट्रेडिंग प्लैटफॉर्म जैसी लगती थी.
रजिस्ट्रेशन पूरा होने के बाद शिकायतकर्ता को लॉगइन आईडी और पासवर्ड दिया गया. वेबसाइट पर लॉगइन होते ही उसे अपना निवेश अकाउंट दिखाई देने लगा. प्लैटफॉर्म की बनावट, अकाउंट की जानकारी और निवेश से जुड़े आंकड़े इतने व्यवस्थित थे कि उसे किसी तरह का शक नहीं हुआ.
अब आरोपियों के लिए अगला कदम शिकायतकर्ता से पैसा जमा कराना था. उसने वेबसाइट को असली समझकर निवेश शुरू कर दिया. रकम एक साथ नहीं, बल्कि कई किस्तों में ट्रांसफर कराई गई. धीरे-धीरे शिकायतकर्ता ने आरोपियों के नियंत्रण वाले बैंक खातों में कुल 27.20 लाख रुपये जमा कर दिए.
हर बार पैसा जमा होने के बाद फर्जी प्लैटफॉर्म पर उसके निवेश की कीमत बढ़ती दिखाई देती थी. स्क्रीन पर मुनाफा लगातार ऊपर जा रहा था. ऐसा लग रहा था कि शेयर बाजार में लगाया गया उसका पैसा तेजी से बढ़ रहा है.
असल में यह सिर्फ एक डिजिटल भ्रम था. स्क्रीन पर दिखाई जा रही बढ़ी हुई रकम को देखकर शिकायतकर्ता को भरोसा हो गया कि उसका निवेश सही दिशा में जा रहा है. वह यह नहीं समझ पाया कि प्लैटफॉर्म पर दिखाई देने वाला मुनाफा सिर्फ उसे फंसाए रखने का एक तरीका था.
करोड़ों दिखे, लेकिन अपना पैसा नहीं निकला
ठगी का असली चेहरा उस समय सामने आया, जब शिकायतकर्ता ने अपना पैसा निकालने की कोशिश की. वेबसाइट पर उसके अकाउंट में निवेश और मुनाफे की बड़ी रकम दिखाई दे रही थी. लेकिन जैसे ही उसने निकासी की प्रक्रिया शुरू की, उसे अपने ही पैसे तक पहुंच नहीं मिली.
उसने 27.20 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे. प्लैटफॉर्म पर रकम बढ़ती भी दिखाई गई थी. इसके बावजूद वह एक रुपया तक वापस नहीं निकाल पाया.
अब उसे शक हुआ कि शेयर बाजार के नाम पर उसके साथ बड़ा खेल हो चुका है. जिस ट्रेडिंग वेबसाइट को वह असली समझ रहा था, वह फर्जी थी. जिस मुनाफे को वह अपनी कमाई मान रहा था, वह केवल स्क्रीन पर दिखाई जा रही संख्या थी. जिन निवेश विशेषज्ञों पर उसने भरोसा किया था, वे कथित रूप से साइबर ठग थे.
अपनी पूरी रकम फंसने के बाद शिकायतकर्ता सूरत साइबर क्राइम सेल के पास पहुंचा. उसकी शिकायत पर पुलिस ने डिजिटल और वित्तीय सुरागों की जांच शुरू की.
बैंक खाते तक पहुंची पुलिस, खुलने लगे बड़े राज
पुलिस ने सबसे पहले यह पता लगाने की कोशिश की कि शिकायतकर्ता के 27.20 लाख रुपये किन खातों में गए थे. रकम के डिजिटल और बैंकिंग रास्ते की जांच करते हुए पुलिस आरआरके पब्लिकबाजार प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के बैंक खाते तक पहुंची.
जांच में सामने आया कि शिकायतकर्ता की रकम इसी कंपनी के खाते के जरिए आगे भेजी गई थी. पुलिस ने जब बैंक खाते के रिकॉर्ड को खंगाला तो लेनदेन का आंकड़ा देखकर जांचकर्ता भी हैरान रह गए.
इस एक खाते से कम समय में 6.53 करोड़ रुपये से ज्यादा का लेनदेन किया गया था. इतनी बड़ी रकम ने संकेत दिया कि खाते का इस्तेमाल केवल एक व्यक्ति से ठगे गए पैसे को आगे भेजने के लिए नहीं किया गया था.
पुलिस को शक हुआ कि यह खाता कई साइबर फ्रॉड से मिली रकम को अलग-अलग जगह पहुंचाने का माध्यम था. यानी इस खाते के जरिए ठगी के पैसे के असली रास्ते को छिपाने की कोशिश की जा रही थी. बाद सामने आई जानकारी ने पूरे मामले को एक बड़े अंतरराज्यीय साइबर अपराध नेटवर्क से जोड़ दिया.
एक ही खाते के खिलाफ देशभर में 149 शिकायतें
जांच के दौरान पुलिस ने संबंधित बैंक खाते का रिकॉर्ड नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल यानी एनसीसीआरपी पर जांचा. यहां पता चला कि इस खाते के खिलाफ पहले से साइबर फ्रॉड की 149 शिकायतें दर्ज हैं.
ये सभी शिकायतें किसी एक शहर या एक राज्य से नहीं आई थीं. देश के अलग-अलग हिस्सों में ठगी का शिकार हुए लोगों ने इसी बैंक खाते की शिकायत की थी.
इस खुलासे से साफ संकेत मिला कि मामला केवल सूरत के एक व्यक्ति से हुई 27.20 लाख रुपये की ठगी तक सीमित नहीं है. पुलिस के मुताबिक, आरोपी देशभर के निवेशकों को निशाना बनाने वाले एक संगठित अंतरराज्यीय साइबर अपराध गिरोह का हिस्सा हो सकते हैं.
आरोप है कि यह गिरोह फर्जी निवेश प्लैटफॉर्म, दिखावटी निजी कंपनियों और धोखाधड़ी के लिए खोले गए बैंक खातों का इस्तेमाल करता था. पहले निवेशकों को वॉट्सऐप ग्रुप में जोड़ा जाता था. इसके बाद शेयर बाजार में असाधारण मुनाफे की कहानियां दिखाई जाती थीं. भरोसा होने पर उन्हें फर्जी वेबसाइट पर अकाउंट खुलवाकर पैसा जमा कराया जाता था.
डिजिटल सबूतों ने पहुंचाया ओडिशा
पुलिस ने डिजिटल सबूतों, बैंकिंग रिकॉर्ड और तकनीकी निगरानी के आधार पर आरोपियों की तलाश शुरू की. जांच के तार ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक पहुंच गए.
सूरत साइबर क्राइम सेल ने एक समन्वित कार्रवाई करते हुए ओडिशा से पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस का आरोप है कि ये पांचों लोग फर्जी निवेश और बैंक खातों के जरिए चलाए जा रहे इस नेटवर्क में शामिल थे.
प्रारंभिक जांच में पता चला कि गिरोह कई पहचान, दिखावटी संस्थाओं और अलग-अलग बैंक खातों का इस्तेमाल करता था. इसका मकसद ठगी से मिली रकम के प्रवाह को छिपाना था.
पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपी आदतन साइबर अपराधी हैं और उनके खिलाफ कई राज्यों में आपराधिक मामले दर्ज हैं. ये आरोपी कर्नाटक, बेंगलुरु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में दर्ज साइबर फ्रॉड के मामलों में पहले भी आरोपी बनाए जा चुके हैं.
एसीपी श्वेता डैनियल ने बताया पूरा तरीका
असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस यानी एसीपी श्वेता डैनियल ने बताया कि शिकायतकर्ता को एक वॉट्सऐप ग्रुप में जोड़ा गया था. ग्रुप में शेयर बाजार में निवेश के जरिए बहुत ज्यादा मुनाफा दिलाने का वादा किया गया.
इसके बाद शिकायतकर्ता से एक फर्जी ट्रेडिंग वेबसाइट पर अकाउंट खुलवाया गया. उसे लॉगइन आईडी और पासवर्ड दिया गया. प्लैटफॉर्म पर भरोसा करते हुए उसने अलग-अलग किस्तों में करीब 27 लाख रुपये जमा कर दिए.
जांच में एक फर्जी निजी कंपनी के इस्तेमाल की जानकारी भी मिली. इसी सुराग के आधार पर पुलिस की टीम ओडिशा पहुंची और पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया.
एसीपी के मुताबिक, आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए बैंक खाते से 6.53 करोड़ रुपये से ज्यादा ट्रांसफर किए गए. इसी खाते के खिलाफ देशभर से 149 साइबर फ्रॉड शिकायतें दर्ज मिली हैं.
अभी बाकी हैं कई सवाल
पांचों आरोपी फिलहाल पुलिस हिरासत में हैं. उनसे पूछताछ कर गिरोह के दूसरे सदस्यों की पहचान की जा रही है. पुलिस यह जानना चाहती है कि ठगी की रकम का अंतिम लाभ किसे मिला और पैसा किन-किन बैंक खातों में भेजा गया. आरोपियों से जब्त डिजिटल उपकरणों, वित्तीय रिकॉर्ड और बातचीत से जुड़े डेटा की जांच की जा रही है. पुलिस यह भी पता लगा रही है कि गिरोह एक साथ कितने फर्जी निवेश प्लैटफॉर्म चला रहा था और अब तक कितने लोग इसका शिकार बन चुके हैं. जांचकर्ताओं को आशंका है कि इस नेटवर्क के पीछे और भी लोग हो सकते हैं. पुलिस ने आगे और गिरफ्तारियां होने की संभावना से इनकार नहीं किया है.यह पूरा मामला दिखाता है कि मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाला मुनाफा हमेशा असली नहीं होता. सूरत के इस व्यक्ति को भी ऐप्लिकेशन में कमाई दिखाई जाती रही. लेकिन जैसे ही उसने अपना पैसा वापस मांगा, पूरा डिजिटल खजाना गायब हो गया.
