“मम्मी… यहां का खाना ऐसा है कि चूहे और कॉकरोच भी शायद न खाएं… अगर काम करने से मना करते हैं तो बिजली के झटके देते हैं… हमें बचा लो…”
फोन पर बेटे की कांपती आवाज सुनते ही परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई. जिस बेटे को कुछ महीने पहले अच्छे भविष्य और 70 हजार रुपये महीने की नौकरी के सपने के साथ विदा किया था, आज वही हजारों किलोमीटर दूर किसी अंधेरे कमरे में कैद होकर अपनी जिंदगी की भीख मांग रहा था.
यह कहानी सिर्फ 30 साल के कौस्तुभ शेजवल की नहीं है. यह उन सैकड़ों भारतीय युवाओं की कहानी है, जिन्हें सोशल मीडिया पर सुनहरे सपने दिखाकर विदेश बुलाया गया और फिर साइबर अपराध के अड्डों में कैद कर दिया गया.
70 हजार रुपये की नौकरी… और जिंदगी बदलने का सपना
महाराष्ट्र के नासिक में रहने वाले कौस्तुभ शेजवल ने 12वीं तक पढ़ाई की थी. वह भी बाकी युवाओं की तरह अपने परिवार की आर्थिक हालत सुधारना चाहता था.
25 अप्रैल को वह घर से निकला. एक दोस्त ने भरोसा दिलाया था कि थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में कॉल सेंटर की नौकरी मिल जाएगी. हर महीने 70 हजार रुपये की सैलरी मिलेगी. परिवार भी खुश था कि बेटे का भविष्य अब संवर जाएगा.
लेकिन कौस्तुभ को क्या पता था कि यह नौकरी नहीं, बल्कि एक ऐसा जाल है, जहां से जिंदा लौटना भी आसान नहीं होता.
बैंकॉक नहीं… सीधे म्यांमार पहुंच गया
कौस्तुभ बैंकॉक पहुंचा जरूर, लेकिन वहां से कुछ लोग उसे अपने साथ ले गए. इसके बाद उसे म्यांमार पहुंचा दिया गया.
यहीं से उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई.
अब वह किसी कंपनी का कर्मचारी नहीं, बल्कि साइबर माफिया का कैदी था.
18 घंटे काम… नहीं तो बिजली के झटके
किसी तरह परिवार से हुई एक छोटी-सी फोन कॉल में कौस्तुभ ने जो बताया, उसे सुनकर हर किसी की रूह कांप जाएगी.
उसने कहा कि उनसे रोज 18 घंटे तक काम कराया जाता है.
अगर कोई थक जाए, बीमार हो जाए या काम करने से मना कर दे, तो उसे कमरे में बांध दिया जाता है और बिजली के झटके दिए जाते हैं.
यही नहीं, वहां फंसी महिलाओं के साथ भी बेहद क्रूर व्यवहार किया जा रहा है.
खाना भी ऐसा… जिसे जानवर भी न खाएं
कौस्तुभ ने अपने परिवार को बताया कि वहां जो खाना दिया जाता है, उसे देखकर भी भूख खत्म हो जाए.
उसके शब्द थे…
“यहां ऐसा खाना मिलता है, जिसे शायद चूहे और कॉकरोच भी न खाएं.”
सोचिए… जिस बेटे ने घर से अच्छे भविष्य का सपना लेकर कदम रखा था, आज वह दो वक्त के खाने के लिए भी तरस रहा है.
सिर्फ कौस्तुभ नहीं… 25 युवक और फंसे हैं
कौस्तुभ अकेला नहीं है.
उसके परिवार का कहना है कि महाराष्ट्र के करीब 25 युवा उसी कैंप में फंसे हुए हैं. इनमें 8 युवक सिर्फ नासिक के हैं.
यानी यह किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि कई घरों की ऐसी दर्दनाक कहानी है, जहां हर दिन मां-बाप अपने बच्चों की सलामती की दुआ मांग रहे हैं.
परिवार अब हर दरवाजा खटखटा रहा है
बेटे की हालत जानने के बाद परिवार लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है.
स्थानीय जनप्रतिनिधि की मदद से उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के आपदा प्रबंधन मंत्री गिरीश महाजन से संपर्क किया.
मंत्री ने पूरे मामले की जानकारी मुख्यमंत्री तक पहुंचाई है और युवाओं को सुरक्षित वापस लाने की कोशिश तेज कर दी गई है.
सूत्रों के मुताबिक, गिरीश महाजन ने नासिक के फंसे युवाओं से भी बात की और भरोसा दिलाया कि सरकार उन्हें वापस लाने के लिए हर संभव कोशिश करेगी.
सिर्फ महाराष्ट्र नहीं… पूरे देश के 400 से ज्यादा युवा फंसे
जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र के 25 युवाओं के अलावा देशभर के 400 से ज्यादा भारतीय युवा ऐसे ही साइबर गिरोहों के चंगुल में फंसे हुए हैं.
इन सभी को सोशल मीडिया के जरिए नौकरी का झांसा दिया गया था.
कैसे फंसाते हैं ये साइबर गैंग?
इन गैंग का तरीका बेहद शातिर होता है.
सबसे पहले सोशल मीडिया या मैसेज के जरिए हाई सैलरी वाली नौकरी का ऑफर दिया जाता है.
कहा जाता है कि…
आईटी कंपनी में नौकरी मिलेगी.
डेटा एंट्री का काम होगा.
डिजिटल मार्केटिंग करनी होगी.
कस्टमर सपोर्ट में काम मिलेगा.
जब युवक विदेश पहुंचते हैं, तब उनके पासपोर्ट छीन लिए जाते हैं.
इसके बाद उन्हें म्यांमार, कंबोडिया, लाओस जैसे देशों में बने साइबर अपराध के अड्डों पर भेज दिया जाता है.
वहां उनसे ऑनलाइन ठगी कराई जाती है.
आखिर उनसे कराया क्या जाता है?
इन युवाओं से अलग-अलग तरह के साइबर अपराध कराए जाते हैं.
जैसे…
ऑनलाइन निवेश के नाम पर ठगी.
क्रिप्टोकरेंसी में फर्जी निवेश करवाना.
डिजिटल फ्रॉड.
बैंकिंग और फाइनेंशियल स्कैम.
अगर कोई तय टारगेट पूरा नहीं करता, तो उसे पीटा जाता है, भूखा रखा जाता है या बिजली के झटके दिए जाते हैं.
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहली बार नहीं है.
इसी साल जनवरी में आंध्र प्रदेश के 120 से ज्यादा युवाओं को म्यांमार के ऐसे ही साइबर अड्डों से छुड़ाया गया था.
वहीं पिछले साल नवंबर और दिसंबर में 79 भारतीयों को सुरक्षित वापस भारत लाया गया था.
यानी यह गिरोह लगातार नए-नए युवाओं को अपना शिकार बना रहा है.
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
आज सोशल मीडिया पर विदेश में नौकरी के हजारों विज्ञापन दिखाई देते हैं. मोटी सैलरी, मुफ्त वीजा और तुरंत जॉइनिंग जैसे वादे अक्सर लोगों को आकर्षित करते हैं.
लेकिन हर ऑफर असली नहीं होता.
अगर कोई कंपनी इंटरव्यू के बिना विदेश भेजने की बात करे, बहुत ज्यादा सैलरी का लालच दे या जल्दी फैसला लेने का दबाव बनाए, तो सावधान हो जाइए.
क्योंकि एक गलत फैसला आपको भी उसी अंधेरे कमरे तक पहुंचा सकता है, जहां से कौस्तुभ अपने परिवार से सिर्फ एक बात कह पा रहा है…
“मुझे यहां से निकाल लो… नहीं पता कल जिंदा रहूंगा या नहीं.”
